


आचार्य श्री महाबोधिसूरिश्वरजी महाराज साहेब जैन धर्म के एक परम पूज्य, विद्वान एवं तपस्वी आचार्य हैं। उन्होंने अपने त्याग, संयम, तपस्या और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से असंख्य श्रद्धालुओं को धर्ममार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान की है। उनका संपूर्ण जीवन जैन धर्म के सिद्धांतों—अहिंसा, सत्य, करुणा और आत्मकल्याण—के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित रहा है। उनके प्रवचन सरल, प्रेरणादायक एवं जीवन को सही दिशा प्रदान करने वाले माने जाते हैं।
आचार्य श्री सदैव आत्मचिंतन, स्वाध्याय, तप और सदाचार को जीवन का आधार बनाने का संदेश देते हैं। उनका मानना है कि मनुष्य का वास्तविक सुख सांसारिक वैभव में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति में निहित है। उनके मार्गदर्शन से अनेक लोगों ने धार्मिक जीवनशैली को अपनाया, नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में स्थान दिया तथा आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
अपने आध्यात्मिक नेतृत्व में आचार्य श्री ने अनेक चातुर्मास, धार्मिक अनुष्ठान, उपधान तप, आयंबिल ओली तथा धर्मसभाओं के माध्यम से जैन संस्कृति और जिनशासन की प्रभावना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके प्रेरणादायी उपदेश समाज में जीवदया, सहिष्णुता, सद्भाव और नैतिकता की भावना को सुदृढ़ करते हैं। वे श्रद्धालुओं को धर्म के साथ-साथ मानवता, सेवा और करुणा के आदर्शों को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
आज आचार्य श्री महाबोधिसूरिश्वरजी महाराज साहेब का व्यक्तित्व श्रद्धा, साधना, ज्ञान और सेवा का प्रतीक माना जाता है। उनका जीवन जैन दर्शन के उच्च आदर्शों का जीवंत उदाहरण है, जो लोगों को आत्मजागृति, संयम और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। उनके आशीर्वाद और मार्गदर्शन से अनगिनत श्रद्धालु आध्यात्मिक उन्नति एवं आत्मकल्याण के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं।
विक्रम संवत २०६५ का हमारा चातुर्मास भिवंडी में हुआ था। चातुर्मास पूर्ण होने के बाद हम भिवंडी के ओसवाल पार्क में आए, जहाँ उपधान तप का प्रारंभ हुआ। कार्तिक वद नवमी का दिन था। शीत ऋतु का समय था और सुबह की ठंड के कारण उपाश्रय के सभी दरवाजे बंद करके हम बैठे थे। किंतु प्रातः लगभग ८ बजे एक अत्यंत दुःखद समाचार ने बंद दरवाजों के बावजूद भीतर प्रवेश कर लिया। वह समाचार था—महेसाणा के निकट चार साध्वीजी भगवंतों के हुए भीषण एवं प्राणघातक दुर्घटना का। एक ही परिवार की उन चार साध्वीजी भगवंतों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना ने दो दिनों तक दिन का चैन और रात की नींद छीन ली।
तीसरे दिन मन कुछ संभलने लगा ही था कि एक बार फिर उसी प्रकार सुबह के समय ऐसे समाचार प्राप्त हुए, जिन्होंने कठोर से कठोर हृदय को भी कंपा दिया। यह समाचार था—विश्वप्रसिद्ध विद्वान पूज्य मुनिराज श्री जंबूविजयजी महाराज के दुर्घटनाग्रस्त होने का। यह समाचार सुनकर हृदय व्याकुल हो उठा। उस समय आँखों में आँसू अवश्य थे, किंतु अंतर्मन में एक प्रज्वलित अग्नि भी धधक उठी थी। मन में विचार आया कि यदि दुर्घटनाओं का यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा, तो भगवान के शासन की व्यवस्था और संतों की सुरक्षा कैसे बनी रहेगी? अब कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा।
इसी वेदना और चिंता के बीच गुणानुवाद की एक सभा आयोजित हुई। एक ओर जिनशासन के प्रति अटूट श्रद्धा और अनुराग था, तो दूसरी ओर हृदय में पीड़ा और चिंता की अग्नि जल रही थी। इसी भावनात्मक वातावरण में संघ के समक्ष कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न रखे गए। प्रश्न यह था कि जब हमारा पुत्र या पुत्री कॉलेज जाता है, जब हमारे पति कार्यालय जाते हैं अथवा पत्नी अपने मायके जाती है, तब हम बार-बार मोबाइल पर यह जानने का प्रयास करते हैं कि वे कहाँ पहुँचे, कब पहुँचेंगे और सुरक्षित हैं या नहीं।