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Vihar Seva Group

About the Vihar Seva

विक्रम संवत २०६५ का हमारा चातुर्मास भिवंडी में हुआ था। चातुर्मास पूर्ण होने के पश्चात हम भिवंडी के ओसवाल पार्क में आए, जहाँ उपधान तप का प्रारंभ हुआ। कार्तिक वद नवमी का दिन था। शीत ऋतु का समय था और सुबह की ठंड के कारण उपाश्रय के सभी द्वार बंद करके हम बैठे थे। किंतु प्रातः लगभग ८ बजे एक अत्यंत दुःखद समाचार ने उन बंद दरवाजों को मानो भेद दिया। वह समाचार था—महेसाणा के निकट चार साध्वीजी भगवंतों के भीषण एवं प्राणघातक दुर्घटना का। एक ही परिवार की उन चार साध्वीजी भगवंतों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना ने दो दिनों तक दिन का चैन और रात की नींद छीन ली। मन बार-बार उसी घटना की ओर चला जाता था और हृदय शोक से भर उठता था।

तीसरे दिन मन कुछ संभलने लगा ही था कि एक बार फिर सुबह के समय ऐसे समाचार प्राप्त हुए, जिन्होंने पत्थर जैसे कठोर हृदय को भी कंपा दिया। यह समाचार था—विश्वप्रसिद्ध विद्वान पूज्य मुनिराज श्री जंबूविजयजी महाराज के दुर्घटनाग्रस्त होने का। यह सुनकर हृदय व्याकुल हो उठा। आँखों में आँसू थे, किंतु अंतरात्मा में एक प्रचंड अग्नि प्रज्ज्वलित हो चुकी थी। मन में बार-बार यही विचार उठ रहा था कि यदि दुर्घटनाओं का यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा, तो भगवान महावीर के शासन की सुरक्षा और संतों का विहार कैसे सुरक्षित रहेगा? ऐसा प्रतीत हुआ कि अब केवल दुःख व्यक्त करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि कुछ ठोस प्रयास करना आवश्यक है।

इन्हीं भावनाओं के साथ गुणानुवाद की एक सभा आयोजित की गई। एक ओर जिनशासन के प्रति गहरा अनुराग था, तो दूसरी ओर संतों की सुरक्षा को लेकर मन में तीव्र चिंता और वेदना थी। इस भावपूर्ण वातावरण में संघ के समक्ष कुछ आत्ममंथन कराने वाले प्रश्न रखे गए। हम अपने पुत्र या पुत्री के कॉलेज जाने पर, पति के कार्यालय जाने पर अथवा पत्नी के मायके जाने पर बार-बार मोबाइल के माध्यम से उनका हालचाल पूछते हैं। हम यह जानकर संतोष प्राप्त करते हैं कि वे सुरक्षित हैं और समय पर अपने गंतव्य तक पहुँच गए हैं।

किन्तु क्या हम अपने गुरु भगवंतों के प्रति भी उतनी ही चिंता और जिम्मेदारी का भाव रखते हैं? क्या हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि वे अपने अगले पड़ाव तक सकुशल पहुँच गए हैं या नहीं? जब प्रभावक आचार्य भगवंत हमारे नगर में पधारते हैं, तब हम बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ उनका स्वागत करते हैं, वाद्ययंत्रों और मंगल ध्वनियों के साथ उन्हें अपने संघ में पधराते हैं। परंतु जब वही गुरु भगवंत हमारे संघ से विहार करते हैं, तब उन्हें अगले गाँव, अगले पड़ाव या स्टेशन तक सुरक्षित पहुँचाने के लिए कितने लोग साथ जाते हैं? यह प्रश्न केवल व्यवस्था का नहीं, बल्कि गुरु भक्ति, उत्तरदायित्व और जिनशासन के प्रति हमारी सच्ची संवेदनशीलता का है। गुरु भगवंतों के आगमन पर सम्मान करना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उनके विहार के समय उनकी सुरक्षा और सुविधा का ध्यान रखना भी है। यही सच्ची गुरु-भक्ति और जिनशासन के प्रति हमारी जागरूकता का परिचायक है।

याद रखिए...

भगवान महावीर को तीर्थंकर बनाने वाली साधना नंदन ऋषि के भव में की गई बीस स्थानक तप की आराधना थी, किन्तु उन्हें सम्यग्दर्शन प्राप्त कराने का कारण नयसार के भव में की गई साधु भगवंतों की विहार-सेवा थी। नयसार ने साधु भगवंतों को द्रव्य मार्ग पर आगे बढ़ाने में सहायता की थी, और बदले में साधु भगवंतों ने उन्हें भावमार्ग पर अग्रसर किया। यह घटना दर्शाती है कि साधु-संतों की सेवा केवल पुण्य का कारण ही नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और सम्यक्त्व की प्राप्ति का भी महान साधन है।

आवश्यक निर्युक्ति आदि आगम ग्रंथों में तीर्थंकर नामकर्म के बंध के लिए बीस स्थानकों का वर्णन किया गया है। इनमें सत्रहवाँ स्थानक है—वैयावृत्य समाधि। इस स्थानक में आचार्य आदि दस प्रकार के साधु भगवंतों की तेरह प्रकार से वैयावृत्य (सेवा) करने का विधान बताया गया है। इनमें दो प्रमुख प्रकार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—पहला, विहार कर रहे साधु भगवंतों की उनके साथ जाकर सहायता करना; और दूसरा, विहार के दौरान दुष्ट व्यक्तियों, चोरों अथवा अन्य बाधाओं से उनकी रक्षा करना। इस प्रकार की सेवा से साधु भगवंतों को समाधि प्राप्त होती है और ऐसी सेवा करने वाले जीव तीर्थंकर नामकर्म के बंध का महान पुण्य अर्जित करते हैं।

वर्तमान समय में इस सेवा की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ गई है। जिस प्रकार रोगग्रस्त साधु की सेवा करने का विशेष लाभ बताया गया है, उसी प्रकार विहार कर रहे साधु भगवंतों की सहायता और सुरक्षा का भी अत्यंत विशिष्ट महत्त्व है। यह केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि जिनशासन की प्रभावना और आत्मकल्याण का श्रेष्ठ साधन है। साधु भगवंतों के विहार को सुरक्षित और निर्विघ्न बनाना वास्तव में धर्म की सेवा करना है।

इतना कहकर मैंने अपना प्रवचन समाप्त किया। प्रवचन के परिणाम की कोई अपेक्षा किए बिना मैं अपने आसन पर बैठ गया। कुछ समय बाद एक युवा मेरे पास आया। उसने कहा, “आज का प्रवचन सुनने के बाद हमने निश्चय किया है कि भिवंडी से जो भी गुरु भगवंत विहार करेंगे, हम उन्हें कम से कम एक स्टेशन तक पहुँचाने अवश्य जाएँगे।” मैं उसके उत्साह और श्रद्धा को देख रहा था। मैंने उससे कहा, “कोई भी संकल्प लेने से पहले अच्छी तरह विचार कर लेना, ताकि भविष्य में पीछे हटने की नौबत न आए।” किंतु वह युवक अपने संकल्प में दृढ़ था और उसकी वाणी में गुरु-भक्ति तथा जिनशासन के प्रति समर्पण स्पष्ट दिखाई दे रहा था।